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Friday, 19 June 2009

एलिक्ज़र ऑफ़ लाइफ


मैं
रोज़ रात में
चांद के घोडे
चुराता हूँ
और दिन में
चांद के
घोडे बेच के
सो जाता हूँ
सोचता हूँ
यदि ये बात
कभी चांद को
पता चल गयी कि
रातो में उसके घोडे
मैं चुराता हूँ
तो मेरा हश्र
क्या होगा ?
चांद मेरी
नज्मों
मेरी ग़ज़लों
मेरे अशआरों
में आना बंद
कर दे तो
क्या होगा?
सुना है
दूर कहीं
नीली
रातों में
एक दरिया
बहता है
सुनता हूँ
एलिक्ज़र ऑफ़ लाइफ
उसमे बहता है .
आजकल बस
उसी की तलाश में हूँ .
और फिलासफ़र स्टोन
वो तो मुझे उसी
दिन ही मिल गया
जिस रोज़
तुम मिले थे
राहों में अचानक
मुझको
इक अरसा बाद